Friday, 14 November 2014

यही हालात इब्तदा[1] से रहे 
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
बेवफ़ा तुम कभी थे लेकिन 
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे
इन चिराग़ों में तेल ही कम था 
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी[2] 
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे
उसके बंदों को देखकर कहिये 
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
ज़िन्दगी की शराब माँगते हो 
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे
शब्दार्थ:
शुरु
संगीत कला
यही हालात इब्तदा[1] से रहे 
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
बेवफ़ा तुम कभी थे लेकिन 
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे
इन चिराग़ों में तेल ही कम था 
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी[2] 
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे
उसके बंदों को देखकर कहिये 
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
ज़िन्दगी की शराब माँगते हो 
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे
शब्दार्थ:
शुरु
संगीत कला
बशीर बद्र साहब की सुनें -
सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं
इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं
दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं
अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ
ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं
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