Saturday, 9 April 2016

बुद्धिमान वो है जो औरों की गलती से सीखता है. थोडा कम बुद्धिमान वो है जो सिर्फ अपनी गलती से सीखता है.मूर्ख एक ही गलती बार बार दोहराते रहते हैं और उनसे कभी सीख नहीं लेते.       

Friday, 8 April 2016

ANOTHER FACE OF OUR SOCIETY

From female foeticide to rape to girls forced into unwanted marriages, incidents that have come to the fore seem to show that India just cannot save its women. A recent one in Haryana reiterates the same. In the state's Kasaan village in Kaithal, a 17-year-old girl was killed by none other than her own father.
  THIS IS HIDDEN FACE OF OUR SOCIETY.....

Friday, 14 November 2014

यही हालात इब्तदा[1] से रहे 
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
बेवफ़ा तुम कभी थे लेकिन 
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे
इन चिराग़ों में तेल ही कम था 
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी[2] 
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे
उसके बंदों को देखकर कहिये 
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
ज़िन्दगी की शराब माँगते हो 
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे
शब्दार्थ:
शुरु
संगीत कला
यही हालात इब्तदा[1] से रहे 
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
बेवफ़ा तुम कभी थे लेकिन 
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे
इन चिराग़ों में तेल ही कम था 
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी[2] 
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे
उसके बंदों को देखकर कहिये 
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
ज़िन्दगी की शराब माँगते हो 
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे
शब्दार्थ:
शुरु
संगीत कला
बशीर बद्र साहब की सुनें -
सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं
इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं
दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं
अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ
ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं
 .....///

Thursday, 7 February 2013

happy roseday ..........


 happy rose day ........





“ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं

उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे

रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में

रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था

फिर न जाने गए किधर तन्हा.”
                                                     
                                

Monday, 7 January 2013

i felt real pain of life in his voice.....

 तुम्हारे सौहार्द और निजता की ..
पीड़ा और संवेदना से उपजे मर्म के,
छल-छल लाये हुए ये  गर्म आंसू ..
 जमी  हुई वर्फ को पिघला सकते है ,
 पर  पत्थरों के सीने में छेद नहीं कर सकते .............


                         When i heard the vibrating voice of that brave boy the above words suddenly appear in my mind. I thought so much about that pain which the boy bear with indian daughter DAMINI...and made a clearcut view about our society. Members of our "civilised and well cultured society " are so cultured and humanised and brave that they have no courage to cover the innocent clothless girl.But they have enough might to valuate the pain of rape victim.......
I think that they have heart or a vacent  place in that place.Our society always tell us what is better for good future they always show the right way, now on what basis I blieve they are my wellwisher and showing the right way? now I have no any respect for them.........